काशी साहित्यिक संस्थान ट्रस्ट द्वारा 2025 की अंतिम प्रतियोगिता आयोजित की जा रही है। आप सभी ने एक गाना अवश्य सुना होगा -"दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई, तूने काहे को दुनिया बनाई।"
तो आपके लिए प्रतियोगिता भी इन्हीं लाइनों में से हैं,आप इन लाइनों में से दो शब्दों को लेकर कविता, गीत, गज़ल,दोहा आदि कुछ भी रच सकते हैं।
प्रतियोगिता की शर्तें:-
1. आपकी रचना देवनागरी लिपि में टंकित होनी चाहिए।
2. दिए गए विषय पर सभी प्रकार की पद्य सकारात्मक रचनाएं मान्य है।
3. रचना में किसी भी प्रकार के अश्लील,असामाजिक व राष्ट्र विरोधी शब्द नही होने चाहिए और न ही इससे सन्दर्भित कोई रचना मान्य है।
4. एक रचनाकार केवल एक ही रचना भेज सकता है।
5-याद रखिए रचना ब्लॉग पर कॉमेंट बॉक्स में ही प्रेषित करना है।
6. चयन पैनल का निर्णय सर्वमान्य होगा।
7. रचना के नीचे रचनाकार की सामान्य जानकारियां जैसे- नाम, शहर,ई-मेल आदि अवश्य लिखी होनी चाहिए।
8. रचना भेजने की अंतिम तिथि: 25-12-2025 है,उसके बाद किसी भी रचनाकार की रचना स्वीकार नही की जाएगी।
9. विजेताओं की घोषणा 28-12-2025 को हमारे समूहों में की जायेगी l
10-रचनाएँ ब्लॉग के कमेंट बॉक्स में ही प्रेषित करें, तत्पश्चात् फेसबुक के पटल पर तभी रचना मान्य होगी।
11- भाग लेने वाले सभी प्रतिभागियों को ई- सम्मान पत्र प्रदान किया जाएगा ।
27 Comments
बनें एक मकबरे को ताज समझा
जमानेंं में जलें है और भी दिल
हवाएं जब चलीं तो राज समझा
बदलते जा रहे दोस्त मेरे
जहाँ की भीड़ ने आवाज़ समझा
मरें हैं प्रेमिका की चौखटो पर
कई प्रेमी जिन्हें मै आज समझा
- सूरज तिवारी
भदोही उत्तर प्रदेश
Kavisurajtiwari@gmail.com
दुख किसका तुम कर रहे,दो खुद को सम्मान।
उगते सूरज की तरह, तुम हो प्रतिभावान।।
देह मिला जो है तुम्हें,ईश्वर का उपहार।
लक्ष्य साध लो हे सखे!,सफल करो अवतार।।
मत कोसो खुद को कभी,कर जीवन मधु-पान।।
उगते सूरज की तरह, तुम हो प्रतिभावान।।
यदि हारे हो युद्ध में, फिर से हो तैयार।
पढ़ लो अब बारीकियाँ,अंतस में लौ धार।।
यत्न निरंतर तुम करो, तथ्यों का हो भान।
उगते सूरज की तरह, तुम हो प्रतिभावान।।
धोखा भी है यदि मिला, दिया किसी ने छोड़।
धन्यवाद दो ईश का, आध्यात्मिक पथ मोड़।।
हर दिन ही है नव सुबह,लो मन में यह ठान।
उगते सूरज की तरह, तुम हो प्रतिभावान।।
दुनिया तेरी है नहीं,कला मंच यह मात्र।
खोकर इसमें तुम बने,मित्र!दया के पात्र।।
अभिनय तुम करते रहो,मन में प्रभु का गान।
उगते सूरज की तरह,तुम हो प्रतिभावान।।
वर्तिका अग्रवाल 'वरदा'
वाराणसी
agrawalvartika555@gmail.com
छन्द: सरसी छंद - 16-11 पर यति और अंत मे गुरु - लघु
आंसू होते अंतर्मन के, भाव भरे उद्गार।
सपने अपने टूटे होगे, या खुशियों के सार।
हर मुश्किल मे खडा रहा है, जो अपनो के साथ।
अपनो का दुख अपना समझा , कभी न छोड़ा हाथ ।
मुश्किल मे जब पाया खुद को, तन्हा करे पुकार।
आंसू होते अंतर्मन के, भाव भरे उद्गार।
जब दो दिल हिल मिल जाते है, करते निशदिन बात।
सपनो की दुनिया मे रहते, दिन हो चाहे रात।
कोई देता दगा प्यार मे, रोता ह्रदय अपार।
आंसू होते अंतर्मन के, भाव भरे उद्गार।
संघर्षो मे जीवन बीते, नहि दिखती हो राह ।
रहते हरदम हाथ ही रीते, मन मे जिसकी चाह।
रंजन सहसा जब हो जाती, खुशियों की भरमार।
आंसू होते अंतर्मन के, भाव भरे उद्गार।
स्वरचित व सर्वाधिकार सुरक्षित
@राजेश तिवारी"रंजन"
स्वराज काॅलोनी गली नंबर-8 जेल रोड बाँदा उत्तर प्रदेश 210001
मोबाइल- 9125604777
Email- rajesh.tiwari4801@gmail.com
ओ माटी से मूरत बनाने वाले,
सुंदर भावो से उसकी छवि को सजाने वाले,
क्या मिलता है तुझको ,हमें जरा ये तो बता,
चल ऐसा कोई हुनर आज हमको भी सिखा।
अजब तू है, अजब तेरी है कलमकारी,
तेरी बनाई मूरत हर मूरत लगे सभी को प्यारी,
हर रुप में ब्यान होती बनाने की तेरी मंशा,
तेरे हुनर की दीवानी हुई दुनियाँ ये सारी।
चल चेहरे मेरे पर आज मुस्कान धर जा,
जो चाहें मेरा मन आज वो पूरा कर जा,
दिल में छुपे है मेरे भी अरमान ढेर सारे,
ओ माटी से मूरत बनाने वाले, सुंदर भावो से उसकी छवि को सजाने वाले।
हो रहा है जीवन मेरा गम्भीर न जाने क्यों,
हो रही हूँ मैं रंगहीन न जाने क्यों,
आ फिर से तकदीर मेरी भी लिख जा।
चल अपना हुनर आज फिर से हमको दिखा।
ओ माटी से मूरत बनाने वाले, सुंदर भावो से उसकी छवि को सजाने वाले।
स्वरचित व मौलिक
सोनिया सरीन ( साहिबा )
दिल्ली
मन भीतर से अकेला
दुनिया कोलाहल का खेला
मन शांत मौन अलबेला
दुनिया आंखो को भरमाती
मन अदृश्य को भी देख लेती
दुनिया चकाचौंध में उलझाती
मन भावनाओं को टटोल लेती
दुनिया भाग- दौड़ करती
तन को खूब थकाती
मन बैठे-बैठे थक जाती
चिंताओं का बोझ उठाती
दुनिया के भीड़ मे खोना नही
मन भीतर सुनना सीखो सही
दुनिया तो केवल एक सराय यही
मन तो असली सदन गृही
दुनिया की झूठी चकाचौंध में,
रात भी जैसे दिनकर है।
मन की गहराई में देखो,
शांत-श्वेत *संध्या* निर्भर है।।
स्वरचित
संध्या अजय मिश्रा (संध्यज)
रायपुर (छत्तीसगढ)
Sandhyjay38@gmail.com
माटी के पुतले
अखिल भारतीय ब्लॉग
प्रतियोगिता
दुनिया बनायी कैसी गजब,,
नमनकंरु मैंआपकी,,
खुश रहना देखकर तबाही मेरे ख्वाब की ,,
तन्हाईयों ने हैं घेरा,
गम का नही कोई सबेरा,,
किससे कहे हम दास्तां
किस दिल करें हम बसेरा ,,
आहटे कोई ना थी,,
कदम थे डगमगायें हुए,,
कल की आस मे ही हम भी खुद को संभाले हुए,,
बना के माटी का खिलौना,,
भरे थे भाव बस पावन,,
इंसान ने थाम लिया लोभ ,
मोह का असत्य का दामन,,
तुम स्वर्ग मे बैठे क्या जानो
इंसान की फितरत बदल गयी,,
प्रेम स्नेह भाव नही कुटिलता ही बस रह गयी,,
सिद्ध बृज रतले
दमोह मध्य प्रदेश स्वरचित
शीर्षक- *सुन ये जगत बनाने वाले*
सुन ये जगत बनाने वाले, क्या रे मनन समाई।
माटी का प्रभु मनुष बनाया,हृद छवि प्रणय बसाई।।
भेजा था सबको खाली कर, इच्छा बहुत बनाई।
अवगुण पाँव बढा़ता जाता, नहीं बची अच्छाई।।
ईर्ष्या लिप्सा नफरत झगड़े, करते प्रेम कटाई।
सुन ये जगत बनाने वाले, क्या रे मनन समाई।।
बढे़ प्रतिष्ठा का कद जैसे, बन जाता अभिमानी।
समझें है दुनिया का राजा, भूले सब इंसानी।
देख हाल दुनिया का प्रभु रे , करता स्वयं जुदाई।
सुन ये जगत बनाने वाले, क्या रे मनन समाई।।
राख बनेगी काया अपनी, फिर क्यों तू इतराता।
संग स्वयं क्या ले जाएगा, फिर क्यों मन ललचाता।।
करले कर्म नेक तू अच्छे, होगी जगत बड़ाई।
सुन ये जगत बनाने वाले, क्या रे मनन समाई।।
लेखिका
डॉ प्रियंका भूतड़ा प्रिया ✍️
@sunitajauhari7
---------------
तूने काहे
मुझे चुना है,
ये काम सौंप दिया है !!
तेरे भरोसे
आगे बढ़ा हूँ,
तुझपे ही टिकता चला हूँ !!
सफर आगे
बढ़ता चला है,
तुझपे विश्वास कायम मेरा है !!
भविष्य आगे
खड़ा मेरा है,
वर्तमान से निखरता चला हूँ !!
साथ तेरे
जीवन सधा है,
तुझसे जुड़कर रोमांच बढ़ा है !!
-------------
सुनीलानंद
बुधवार,
17.12.2025
जयपुर,
राजस्थान |
दुनिया बनाने वाले ने बहुत,
खूबसूरत दुनिया को है बनाया |
दुनिया की शोभा को बढ़ाने के
लिए,
इंसान का निर्माण है किया |
दुनिया में रहते अनगिनत इंसान है |
पर आज आता नही कोई किसी,
के काम है |
हर इंसान अपना स्वार्थ है आज,
देखता है |
कार्य को पूर्ण करवाने के लिए,
इंसान आज कैसा भी रूप धर
लेता है |
इंसान इंसान का ही दुश्मन है
आज,
सभी को दौलत के पलड़े में है,
तौलता है आज |
पैसे के चक्रव्यूह में है फँसते,
है सभी आज |
पैसे कमाने के लिए ना जाने,
क्या-क्या है करते आज |
पैसे के लिए इंसान आज कुछ,
भी है कर देता |
पैसे को कमाने के लिए इंसान,
किसी भी हद तक है जा सकता |
दुनिया बनाने वाले ने इंसान को,
है बनाया था |
पर इंसान ही है आज इंसानियत,
को है खत्म कर रहा |
इंसान से अच्छा जानवर है,
जो सदियों से मालिक का है
वफादार रहा |
जिस इंसान को ईश्वर ने बहुत,
सोच विचार कर है बनाया |
उसी इंसान ने है आज दुनिया,
को खतरे में है डाला |
पैसा ही आज भगवान है,
पूंजीपतियों का ही आज राज है |
नाम -रजत त्यागी
जिला- मुजफ्फरनगर
राज्य- उत्तरप्रदेश
ईमेल आईडी- rajat tyagi 14061993@gmail. com
तू काहे दुनिया बनईला हे रामा,
दुख के लेखा लिख दीहल।
हँसत-खेलत अँखियन खातिर,
काहे आँसू रख दीहल।
एके माटी, एके पानी,
एके साँस के धारा।
फेर ऊँच-नीच, राजा-रंक,
काहे बनावल सारा।
मइया रोवे भूख से लइका,
धरती भरल अन्न।
भूख मिटे के राह बताइ द,
काहे सुतल भगवन।
प्रीत सिखा के जग में रामा,
नफ़रत बीज बोवावल।
भाई-भाई कटे वार से,
धरम के नाम चलावल।
मंदिर-मस्जिद एके माटी,
एके ईश्वर नूर।
फेर खून से लिखे कहानी,
काहे बनवल दस्तूर।
सच के दिया डगमग डोले,
झूठ जगल हर ठाँव।
न्याय के नागिन सुतल परोस में,
रोवे सगरी गाँव।
कहत 'राज़' पुकार के रामा,
अबहूँ देर न होय।
करुणा के बरखा बरसा द,
फेर से मानव होय।
गुरुदास प्रजापति 'राज़'
अखिल भारतीय ब्लॉग प्रतियोगिता
दिनांक 19- 12-2025
तेरे मन में क्या है
इस पार खड़ा हृदय पुकारे, उस पार मौन तुझे घेरे,
धड़कन-धड़कन पूछ रही है, क्या भाव हृदय में तेरे।
शब्दों की यह नदी बीच में, फिर भी नयन मिल जाते,
उस पार की हल्की मुस्कानें, इस पार श्वास बन जाते।
तू सोच रहा मैं समझ न पाऊँ, पर मन सब पढ़ लेता,
होठों से निकला एक ही शब्द, सारा जग भर देता।
तेरे मन का हर कोना क्यों, मेरे नाम से डरता है,
छुप भी जाए जो प्रेम हृदय में, वह प्रेम ही होता है।
तू एक कदम यदि आगे बढ़े, मैं काल से पहले आऊँ,
इस पार धड़कता हृदय मेरा, हर पल तुझे ही गाऊँ।
अब मौन तोड़ दे, कह दे साजन, मन में छाया है,
इस पार खड़ा प्रेम तेरा, पूछे मन में क्या है?
— सुकेशी (बरखा)
बनाने वाले
नमन तुझे, ओ जगत बनाने वाले, कैसी तेरी ये रचना निराली।
तूने शून्य से सृष्टि खड़ी कर दी, हर रंग भरा, हर रूप ढाली।
तेरा कैसा विधान, कैसी ये माया, जिसकी थाह न कोई कर पाया।
आकाश तेरा, यह धरती तेरी, तेरी ही छाया में सारा जग समाया।
तूने बनाए सात समंदर, पर्वत बनाए, पत्थर में तूने प्राण बसाए।
नदियों की कलकल, झरनों की धुन, हर ध्वनि ने तेरे ही गीत गाए।
तू ही चंद्र की शीतलता निर्मल, तू ही बसंत, तू ही पतझड़ की हलचल।
कण-कण में तेरा वास छिपा है, तू ही है शाश्वत, तू ही विधाता पल-पल।
फूलों में रंग, खुशबू तूने दी, फसलों को जीवन, अद्भुत विधि दी।
कहीं कोमल घास, कहीं कठोर चट्टान, सारे भेद तूने ही रच दी।
तेरा कैसा मन, क्या तेरी भिक्षा, किस कारण तूने रची यह दीक्षा।
क्या तेरे भीतर भी कोई प्रश्न था, क्या उत्तर पाने को ली यह इच्छा।
मानव को तूने बुद्धि दी इतनी, जो हर क्षण करता है तेरी विनती।
ढूँढता है तेरा पता हर पल, पर पा न सका कोई अच्छी युक्ति।
तूने काहे को यह जग बनाया, हर मन ने यह प्रश्न दोहराया।
सुख-दुख की क्यों डोर बाँध दी, क्यों जीवन को मृत्यु से मिलाया।
कहीं हँसी है, कहीं आँखों में पानी, तेरी कहानी तू ही है ज्ञानी।
तूने ही दिया प्रेम, तूने ही घृणा, तू ही तो है सबका अंतर्यामी।
हम तो मिट्टी के पुतले हैं सारे, तू ही साँस दे, तू ही फिर मारे।
तेरी मर्जी से ही सब कुछ हो, हम तो बस तेरे हैं दास-दुलारे।
तू है माता, तू ही पिता है सबका, तू ही जीवन का हर एक लम्हा।
तू ही कर्म, तू ही उसका फल है, तू ही धर्म, तू ही है परम ब्रह्मा।
हम मंदिर-मस्जिद में तुझे पुकारें, या तीर्थों में जाकर ढूँढते फिरें।
तू तो बैठा है भीतर हमारे, जिसको हम व्यर्थ बाहर तुझे निहारें।
तू नज़रों से ओझल, पर हर ओर है, तू ही दिन की पहली भोर है।
तू ही है शांत रात का सन्नाटा, तू ही जीवन की चलती डोर है।
ओ बनाने वाले, ओ सृजनकार, तेरी कला को करते हम स्वीकार।
तेरी माया का पार न पाएँ, बस चरणों में करते हैं हम आभार।
तू ही आशा, तू ही निराशा, तू ही प्यासा, तू ही अंतिम दिलासा।
तेरा नाम जपे हर एक प्राणी, तेरी भक्ति ही है सच्ची परिभाषा।
विधाता, तेरी लीला अनंत है, तेरी शक्ति है अविचल, दिगंत है।
तूने बाँधा है ये काल-चक्र, तू ही आदि है, और तू ही अंत है।
हम इस जग के रंगमंच पर नट हैं, तू ही तो सूत्रधार है।
तेरे इशारे पर सब नाचें, तू ही सबसे बड़ा कलाकार है।
तेरी रचना में हम खुश रहें, तेरे दिए जीवन को हम सार्थक करें।
यही अरदास है, यही है कामना, तेरे चरणों में हर पल हम जिएँ।
हम अज्ञानी, तू ज्ञान का सागर, तेरे आगे हम सब हैं नतमस्तक।
ओ बनाने वाले, इस जग के स्वामी, तुझसे सुंदर कुछ भी है मगर।
महेन्द्र तिवारी
पता: स्थापना अनुभाग, राष्ट्रीय अभिलेखागार, जनपथ, नई दिल्ली- 110001
मोबाइल: 9989703240
ईमेल: mahendratone@gmail.com
शीर्षक-माटी के पुतले
दुनिया बनानेवाले ने किया गजब कमाल।
माटी के पुतले गढ़े, नाम दिया इंसान।
अलग-अलग हैं रूप रंग, अलग-अलग हैं वेश।
कोई पूजे रहमान, कोई पूजे महेश।।
नदिया सागर झरने, सब तेरे ही कलाकारी।
पशु -पक्षी भी तरह-तरह के, सबकी अपनी अदाकारी।।
जीवन की प्रक्रिया कैसी, सब एक दूजे पर निर्भर।
कोई भूख मिटाता कन्द मूल से, कोई जीव हत्या को तत्पर।।
मतिश्रेष्ठ बनाया मानव को , नित्य रचे इतिहास।
सभी क्षेत्र में बढ़ता आगे, करता नित्य विकास।।
कैसी रची ये दुनिया तूने, बना खिलौना मानव है।
निज स्वार्थ पूर्ति हेतु, बन बैठा वह दानव है।।
नमन करूँ तुझको मैं, तेरी लीला अपरंपार है।
खेल सभी रचते तुम हो, मानव बना आधार है।
तेरी महिमा तू ही जाने, कोई समझ न पाया है।
हम तो कठपुतली तेरे हाथ के, नाचे जैसे नचाया हैं।।
अंजलि किशोर “कृति”
उखरा, पश्चिम बंगाल
ईमेल आईडी-anjalikishore1984@gmail.com
@sunita jouhari
दिनांक --19/12/2025
शब्द --दुनिया , तूने
।। कविता।।
बहुत खूबसूरत थी तेरी दुनिया,
समंदर भी उतर आया,
किनारों से ही देखा तूने,
कुछ गोते तो लगाना चाहिए था।
मझधार में पतवार तो अकेला ही चलता है,
कश्ती के साथ-साथ सिमटना भी चाहिए था।
वफा के नाम पे ठगते रहें,
इकरार प्यार का भी करते रहे ,
तारीकी जमीं थी जगमगाती रौशनी में,
लहरों की तरह मेरे शब को सहरना चाहिए था।
बेखबर मैं तेरी हर आहट से हमसफर
मैं भी हूं हमसफर तू भी है ,
शहर की हवा खा लो जरा,
आसमान से दोस्ती करके।।
जिंदगी भर तेरा सवाल आया,
दिल की दरिया में तूफान आया,
बिखरी किरचियों को संवारते क्या,
आईना पत्थरों को ना संभाल पाया।।
सजी थी महफिल उनकी नज़्मों से,
बैठे-बैठे दिल एक खयाल आया,
हिसाब कौन रखता है दरयाओं का,
जिंदगी जीने का सैलाब आया।।
स्वरचित ✍️ रजनी कुमारी
लखनऊ,उत्तर प्रदेश
मुहब्बत की है ये बातें जो तेरे मन को महकाए
हवाएं गुजरे छूकर के नशा सावन को हो जाए
कभी हंसती हो छुपकर के,
कभी तुम मुस्कराती हो
खिजाओ में भी तुम जाना,
बहारें लेके आती हो
तेरे सांसों की खुशबू ही गुलाबों को भी महकाए
हवाएं गुजरे छूकर के नशा सावन को हो जाए
मुहब्बत की है ये बातें जो तेरे मन को महकाए
जो आंखों को बंद कर लो
तो उजाले में अंधेरा हो
तेरे होंठों के थिरकन से
मधुर संगीत बजता हो
कभी जुल्फें बिखेरो तो घटा बादल में छा जाए
हवाएं गुजरे छूकर के नशा सावन को हो जाए
मुहब्बत की है ये बातें जो तेरे मन को महकाए
चाल हिरनी सी है तेरी
पांव पायल खनकती है
उंगलियों से जो छू दे तो
लताएं गाने लगतीं हैं
जो छू दे प्यार से तूं तो फूल कांटों में खिल जाए
हवाएं गुजरे छूकर के नशा सावन को हो जाए
मुहब्बत की है ये बातें जो तेरे मन को महकाए
रंजना पाण्डेय मुक्ता
मिर्जापुर, बनारस
दुनिया बनाई...
***
दुनिया बनाने वाले,जीवन की जीत दिलाई
सुन्दर सी दुनिया सजाई
दे दी हैं नदियाँ,पर्वत अनोखे,
खुशबू से भरते हैं नित्य झरोखे ।
मौसम सभी हैं ऋतु भी सुहानी,
आकर भी कहती अपनी कहानी...
लोक में मिलते ही मिल कर के भाई ,सुन्दर सी दुनिया बनाई...
दुनिया बनाने वाले...
धरती के हैं मित्र जीवाणु,
पशु -पक्षी और सभी विषाणु,
रौनक किलकारी से आंगन,
उत्सव आते सजते प्रांगण ,
शब्दों में गणना न समाई...कैसी ये दुनिया बनाई...
दुनिया बनाने वाले...
डाॅ.वन्दना मिश्र
भोपाल
drvandanamishra01@gmail.com
बनाने वाले ने वाह! क्या भाग्य ये रच दिया
जिसे भुलाना चाहा, यादें बना मन में रख दिया
कभी भावों को न दिखाएँगे, सोचा बहुत था..
बस!! आँसुओ ने ये तो धोखा दे दिया
बनाने वाले ने मेरे जीवन में कमाल कर दिया
बनाने वाले ने वाह! क्या भाग्य ये रच दिया
जिसे भुलाना चाहा, यादें बना मन में रख दिया
कभी दुखों को न दर्शाएंगे
विचारा बहुत था!
बस आँखों ने साथ देना छोड़ दिया
भावों को मना लिया कभी न बोलेंगे, पर
सामने दोस्तों को देखा तो सब्र ने साथ छोड़ दिया
बनाने वाले ने वाह! क्या भाग्य ये रच दिया
जिसे भुलाना चाहा, यादें बना मन में रख दिया
सोचा था मन को आईने में बंद कर देंगें
ख़ुद ही निहारेंगे, कभी गिला न करेंगे
तेरे जगाए सपनों को पूरा करेंगे
निराशा का दामन हरगिज़ न थामेंगे
चुपके से आईने ने ये क्या कह दिया
बनाने वाले ने वाह! क्या भाग्य ये रच दिया
जिसे भुलाना चाहा, यादें बना मन में रख दिया
डॉ वंदना घनश्याला की कलम ✍️से
सुनीता दी ये हो नहीँ रहा, कृपया आप डालने का कष्ट कर देंगे क्या 🙏🙏😊
अंतिम प्रतियोगिता 2025.
शब्द:--तूने काहे ।
विधा --गीत (सार छंद पर आधारित है).
विधान :- 16,12 मात्राओं पर यति पदांत 22.
***************************************
तूने काहे जगत् बनाया, मेरी समझ न आया।
छोटा मोटा दुबला-पतला,प्राणी विविध रचाया।।
१- किसी को तूने महल दिये हैं, सुंदर पत्नी बच्चे।
कोई सोता फुटपाथों पर, घर भी दिए न कच्चे।
किसी का गोरा बदन बनाया,किसी की काली काया।
तूने काहे जगत् बनाया, मेरी समझ न आया।।
२- कहीं बनाए ऊॅंचे पर्वत, कहीं तू जंगल -झाड़ी।
कहीं -कहीं पर सिंधु रचे हैं, है तू राम खिलाड़ी।
कहीं बनाए सूने समतल, जहॉं न तरुवर छाया।
तूने काहे जगत् बनाया, मेरी समझ न आया।।
३ कोई जानवर दुबले-पतले, और रच दिए छोटे।
कोई लंबे चौड़े भारी,और बनाए मोटे।
कुछ तो ख़तरनाक रच डाले,जिन्हें देख घवराया।
तूने काहे जगत् बनाया, मेरी समझ न आया।।
४- कहीं अवनि में सोना चाॅंदी, कहीं कोयला काला।
सभी तरह के अन्न मसाले, खाने को दे डाला।
क्यों तू कष्ट उठाता क्षण-क्षण,अब तक नहीं बताया।
तूने काहे जगत् बनाया,मेरी समझ न आया।।
५- तेरी लीला तू ही जाने, मैं तो हूॅं अज्ञानी।
हे!जग सृष्टा दर्शन दे जा,कलाकार हे! ज्ञानी।
मैं भी तेरा बड़ा ऋणी हूॅं,जो तू मुझे बनाया।
तूने काहे जगत् बनाया, मेरी समझ न आया।।
**************************************
उपर्युक्त गीत रचना मेरी मौलिक है।
डॉ.राम सहाय बरैया ग्वालियर (म.प्र).
ए-खुदा! तुझसे मुझे कोई शिकवा नहीं,
बस गिला-ए-दिल में है मेरे।
आऊंगा जन्नत तो तुझसे पूछूंगा।
ए-खुदा !उस हसीना के लिए मेरे दिल में,
इतनी मोहब्बत क्यों बनाई?
जिसे छोड़ने का कभी दिल नहीं किया।
फिर भी तू दूर करके उससे,
मेरा दिल क्यों दु खाया?
धरती पर जिस्म छोड़कर तेरे पास आया हूं।
अब भी वो नज़र क्यों आ रही है?
कोई तो इसका कारण होगा, मेरे खुदा।
हां,तुझे-मुझे पाना था।
इसलिए तेरे दिलरुबा को दूर करना था,
हां, सही कहां तूने,मेरे खुदा।
क्योंकि उसमें तो तेरा ही नूर नज़र आता था।
महबूबा और ख़ुदा में कोई अंतर नहीं होता,
महबूबा में सारी दुनिया होती है,
सारी दुनिया खुदा के अंदर होती है।
रचनाकार -पंडित लवकेश तिवारी कुशभवनपुरी
ई-मेल -lavkeshtiwari654@gmail.com
शब्द:-
दुनिया, बनाने, वाले ,मन
**********************
दुनिया बनाने वाले प्रभु ,तुम हो अद्भुत कलाकार।
कण- कण सुरभित ब्रह्मांड का , तुम अदृश्य ! निराकार!
सूर्य को दिया अग्निरूप, चंदा को सुंदर शीतलता ।
पर्वत को दिया शीर्ष सम्मान, नदियों में बहती निर्मलता ।
नभ में पक्षियों को चहकाया , कोयल को दी मधुरता ।
डालों पर कलियों को मुस्काया ,पुष्पों को दी सुंदरता।
बरखा में प्यारी रिमझिम बूॅंदे , इंद्रधनुष में सुंदर रंगों को पाया ।
जीव ,जंतु घूमें अद्भुत, प्रकृति को हरियाली से महकाया।
तुमसे , ग्रह, नक्षत्र , तारागण दमकते ।
गहरे सागर में सीप के मोती चमकते ।
तुमको ढ़ूढे मंदिर, गुरुद्वारे में और गीता ,कुरान ,वेदों में।
माॅं की ममता में दिखे, ऋषियों, मुनियों के मृदु वचनों में।
तुम रहते करुणा, दया में ,
मौन ,शांति में तुमको पाऍं ।
गूॅॅंज तुम्हारी मधुबन की मुरली में, तुम ही सब सम्भव कर पाए।
जीवन चक्र के विधाता , प्रेम, ज्योत जलाते हर मन में।
हर श्वाॅंस में अहसास तुम्हारा,
और छिपे हर धड़कन में ।
करुणा ,दया नम्रता,सद्कर्मों में है निवास।
प्रेम ,शुचिता और मानवता में तुम्हारा वास।
अहंकार जब होता मन , सबक तुम सिखाते ।
भटक जाए राह कोई , पथ प्रदर्शक बन आते।
निराशा के अंधकार से जब मानव घिर जाते।
थाम लेते हाथ तभी ,मन आशा का दीप जलाते ।
ऐ !दुनिया बनाने वाले , तुम्हारी लीला अपरम्पार ।
जीवन दिया अनमोल तुमने , कृतज्ञ हूॅं ,नमन करूॅं बारम्बार।।
नीता माथुर, 'नीत'
लखनऊ ,उत्तर प्रदेश
स्वरचित/मौलिक रचना
Email neetasatish22@gmail.com
Mob. No .9956572810
किसी को दिये छपन भोग, किसी को एक रोटी भी ना पाई।
दुनिया बनाने वाले क्या दुनिया तूने बनाई।
किसी को दिया राजपाट सब,
किसी को दी ना चटाई।
दुनिया बनाने वाले क्या दुनिया तूने बनाई।
किसी को दिये रेशम वस्त्र,
किसी को एक चादर भी ना पाई।
दुनिया बनाने वाले क्या दुनिया तूने बनाई।
किसी को दिये महल चौबारे,
किसी को झुग्गी भी ना पाई।
दुनिया बनाने वाले क्या दुनिया तूने बनाई।
कोई बोले अंग्रेजी चटर पटर,
किसी को हिंदी भी ना आई।
दुनिया बनाने वाले क्या दुनिया तूने बनाई।
किसी को दिये नौकर चाकर,
किसी को खुद नौकरी ही ना पाई।
दुनिया बनाने वाले क्या दुनिया तूने बनाई।
अमीरी गरीबी का भेद देख कर,
मैं भी हूँ चक्राई।
दुनिया बनाने वाले क्या दुनिया तूने बनाई।
डाॅ० ललिता
दुनिया बनाने वाले, क्या तेरे हाथों में समाई,
काहे को दुनिया बनाई तूने, काहे को दुनिया बनाई।
कभी फूलों में खुशबू रखी, कभी आँखों में नमी,
कभी माँ की ममता गहरी, कभी भूख की परछाई।
किसी को महलों की चादर, किसी को टूटी सी छत,
किसी की झोली भर डाली, किसी की खाली आई।
सूरज सब पर एक सा चमके, फिर भेद क्यों राहों में,
कहीं उजली सुबह बसी है, कहीं अँधियारी छाई।
क्यों सपनों को पंख दिए, फिर तोड़ दिए तूने,
क्यों आशा की लौ जलाई, फिर आँधी बन आई।
दुनिया बनाने वाले, बस इतना सा पूछें हम,
अगर दर्द भी लिखना था, काहे को दुनिया बनाई।
दीपांजलि दीपा बहन शिम्पी
बनाने वाले ने वाह! क्या भाग्य ये रच दिया
जिसे भुलाना चाहा, यादें बना मन में रख दिया
कभी भावों को न दिखाएँगे, सोचा बहुत था..
बस!! आँसुओ ने ये तो धोखा दे दिया
बनाने वाले ने मेरे जीवन में कमाल कर दिया
बनाने वाले ने वाह! क्या भाग्य ये रच दिया
जिसे भुलाना चाहा, यादें बना मन में रख दिया
कभी दुखों को न दर्शाएंगे
विचारा बहुत था!
बस आँखों ने साथ देना छोड़ दिया
भावों को मना लिया कभी न बोलेंगे, पर
सामने दोस्तों को देखा तो सब्र ने साथ छोड़ दिया
बनाने वाले ने वाह! क्या भाग्य ये रच दिया
जिसे भुलाना चाहा, यादें बना मन में रख दिया
सोचा था मन को आईने में बंद कर देंगें
ख़ुद ही निहारेंगे, कभी गिला न करेंगे
तेरे जगाए सपनों को पूरा करेंगे
निराशा का दामन हरगिज़ न थामेंगे
चुपके से आईने ने ये क्या कह दिया
बनाने वाले ने वाह! क्या भाग्य ये रच दिया
जिसे भुलाना चाहा, यादें बना मन में रख दिया
डॉ वंदना घनश्याला की कलम ✍️से
दिल्ली
vandanaghansyala@gmail.com
काशी साहित्य संस्थान
काव्य लेखन प्रतियोगिता
शब्द- 1)मन 2)दुनिया
शीर्षक- लाडो मेरी आ जाना
--------------------------
पवित्र सावन माह में एक मां की स्नेह, प्यार और दुलार भरी प्रेम पाती अपनी बेटी के नाम;;;
*लाडो मेरी आ जाना*
---------------*-----------
लाडो सावन आने वाला,
जल्दी से घर आ जाना,
कजरी के मेले हैं सज गए,
हिंडोला भी झूलना।।
बड़े प्यार से तेरे लिए,
हरी चूड़ियां मैं लाई,
अपने हाथ से पीसकर,
मेहंदी तेरे लिए बनाई।।
धानी चूड़ी अपनी ही,
कलाई में सजा लेना,
रचनू वाली मेहंदी लाडो,
हाथों में लगा लेना।।
बेटी तेरे खेल खिलौने,
गुड्डे गुड़िया झांकते,
आज सजे अलमारी में,
तेरी याद है दिलाते।।
वीरा भी अपने मुख से तो,
देखो कुछ न बोलते,
उनकी सूनी आंखों से,
उनके दर्द बयां होते।।
तेरे बाबा रोज सोचते,
अब कितने दिन हैं बचे,
रोज सुबह कैलेंडर लेकर,
उंगलियों से दिन है गिनते।।
खनखनाती कोड़ियाँ,
इमली के बीज फोड़ेंगे,
जल्दी से आ जाना लाडो,
मिलकर अठ्ठू खेलेंगे।।
रेशम,सुई धागा की डिब्बी,
वो भी ज्यों की त्यों रखी,
अपने वीरा के लिए,
जिससे राखी बनाती थी।।
कपड़ों की अलमारी से भी,
एक खुशबू है आती,
तेरी लाल चुनर देखो,
एहसास तेरा है दिलाती।।
घर का आंगन लगता सूना,
मन का भी हर कोना सूना,
अपने मन की बात कहूं मैं,
अब तो कोई नहीं है अपना।।
लोक लाज मर्यादा का,
खूब ध्यान बेटी रखना,
तू तो मेरी परछाईं है,
शांत स्वभाव सदा रखना।।
इस दुनिया की सारी खुशियां,
लाडो तुम पाते रहना,
सब का सिर ऊंचा रहे,
ऐसे काम सदा करना।।
#
साधना छिरोल्या
दमोह(मध्यप्रदेश)
=================
अखिल भारतीय ब्लाग आधारित प्रतियोगिता
काहे को दुनिया बनाई
दुनिया बनाने वाले
दुनिया तुमने क्यो बनाई।
ये बहुत गहरा सवाल
ईश्वर की लीला या
प्रेम का विस्तार।
अपनी इच्छा को ही साकार किया
अपने प्रेम को ही व्यक्त किया।
खेल खेल मे ही दुनिया बनाई
वे अकेले थे बगोदर मे सबको ले कर ।
अकेले अकेले मन नही लगा
अपने मन को वहलाने के लिए ।
सृष्टी की रचना की
यह प्राकृतिक प्रक्रिया है एक ही ।
इसमे सभी सुविधाऐ दी
जीव जन्तु पेड पौधे जल जंगल सभी का निर्माण किया ।
इसी रचना के तहत भिन्न भिन्न प्रकृति भिन्न भिन्न लोको का निर्माण किया ।
मनुष्य जन्म का एक विशेष महत्व है
जीव अपने कर्मो के अनुसार ही ।
तरह तरह के अनुभव करते
दुनिया बनाने वाले का एक उद्धेश्य भी है ।
मनुष्य ईश्वर को खोजे
जीवन के अनुभव को जी ले ।
हमेशा के लिए स्थिर हो जाय
जीव का जन्म इसी लिए होता ।
वो प्रभु से प्रेम करे और उन्हे पा ले
सभी मनुष्यो मे अलग-अलग बुद्धी ।
अलग-अलग विचार
अलग-अलग प्रकृति
अलग-अलग गुण होते ।
जिससे अपने विवेक से
क्या सही क्या गलत ।
सोचना समझना है
और प्रभु को पाना है ।
उन्हे प्रेम द्वारा पाना
यही उद्धेश्य लेकर ।
दुनिया को वनाने वाले ने
दुनिया की सृष्टी की ।
नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद झारखंड